जॅाज

Jaws हालीवुड में उपन्यासों पर फिल्मे बनाने का सिलसिला काफी पुराना है | इसी क्रम में १९७५ में एक फिल्म आई थी “जॅाज” | हालाकि उस समय चु:कि हमारा इस दुनिया के रंगमंच पर पदार्पण नहीं हुआ था सो बड़े परदे पर इसे देखने का अवसर तो चूक गए (वैसे उस समय इंडिया में वेस्टर्न फिल्मे शायद ही किसी को नसीब होती होंगीं) लेकिन हाल फिलहाल में हमारी यह तमन्ना पूरी हुई |

जॅाज – पीटर बेंचले के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी| जिसका निर्देशन किसी और ने नहीं बल्कि प्रसिद्ध निर्देशक “स्टीवन स्पीलबर्ग” ने किया था | और पटकथा की जिम्मेदारी खुद पीटर बेंचले ने कार्ल कार्ल गोटलिएब  के साथ मिलकर उठायी थी | यह भी बताते चलें कि स्पीलबर्ग कि यह पहली मास्टरपीस मानी जाती है|

फिल्म कि कहानी एक ग्रेट व्हाईट शार्क के इर्द गिर्द घुमती है, जो अचानक “ एमिटी आईलैंड” पर आ जाती है | यह आइलैंड समर रिजार्ट के रूम में जाना जाता है और इस समय यहाँ पर्यटकों का मेला लगा होता है | नतीजा एक दो खून खच्चर भरे दृश्य | आइलैंड का शेरिफ और कहानी का हीरो या सही मायनो में “प्रोटेग्निस्ट” मार्टिन ब्रोडी इस शार्क का काम तमाम करने का बीड़ा उठाता है |

Jaws 2 एक प्रोफेशनल शार्क हंटर और एक ओसिनोलोजिस्ट के साथ मार्टिन शार्क का पीछा करता है | फिल्म के अंत तक आते आते प्रोफेसनल हंटर खुद ही शार्क के द्वारा हंट कर लिए जाते हैं, ओसिनोलोजिस्ट भाग खड़े होते हैं, लेकिन मार्टिन मिशन कम्प्लीट करने में सफल होता है |

फिल्म कि सबसे खास बात है – इसका प्रोग्रेसन, जो कभी भी आपको आराम से बैठने नहीं देता ‘”अब क्या होगा का सवाल दिमाग में भन्नाता रहता है” | और इसका श्रेय फिल्म कि चुस्त पटकथा को जाता है | बाकी शानदार अभिनय, बेहतरीन कैमरा और निर्देशन भी फिल्म में जान फूकता है |

अपने समय कि ब्लाक्बस्टर फिल्म आज क्लासिक फिल्मों कि श्रेणी में गिनी जाती है, और अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट ने इसे सर्वकालीन महान फिल्मों की सूची में ४८वें नंबर पर रखा है |

अगर आप इस सप्ताह कुछ नहीं कर रहे (मतलब  खाप या “ गांधी टू हिटलर “ देखने नहीं जा रहे) तो इधर उधर कही से इसका जुगाड करिये | एक बार देखिये तो सही | मजा ना आये तो पैसा वापस |

  नोट: ( पैसों के लए कृपया “स्टीवन स्पीलबर्ग” से संपर्क करें ) |

कास्ट अवे – you have to breath until u get a way.

आम तौर पर हम संचार के बारे मे किताबो  मे ही पढते है उससे हि हमे पता चलता है कि आखिर मनुष्य ने भाषा का आविष्कार क्यु किया . लेकिन अगर आप को याद हो तो इन किताबो मे अनडरलाइन करके बताया जाता है कि हम ९७ % संचार नान वर्बल करते है. ऐसे मे कई बार लगता है कि भला फ़िर इस ३ % सन्च्हर को लेकर इत्ना हो हल्ल क्यु मचाया जा है. हम ९७ % के साथ भि तो अपना काम चला सकते है . सवाल सही भी है . लेकिन इसका जवाब है नहि.
अब इसके लिये मै आपको कोइ लम्बा चौड़ा भाषण नही दूगा. बल्कि आपको एक छोटा सा सुझाव दूगा. सुझाव भी ऐसा जिसे सुनकर यकिनन हर भारतीय खुश हुये बिन नहि रह पायेगा. आपको करना बस इत्ना है कि एक फ़िल्म देखनी है-कास्ट अवे. और दोस्तो मेरा वादा रहा आपको अपना जवाब जरुर मिलेगा. टाम हैंक्स के बेहतरीन अभिनय से सजी आस्कर विजेता यह फ़िल्म हमारी आजकल के दौर से हि शुरु होती है लेकिन जल्दी ही हमारे आज से निकलकर वहा चली जाती है जहा से हम सभी निकले थे.
मानव कि अपनी कमजोरिया है और अप्नी ताकते है. वो बडे से बडा तूफ़ान सह सकता है . अकल्पनीय चिजो क निर्माण कर सकता है . लेकिन किसी छोटी सी वजह के चलते बिखर सकता है. इस्मे देखा जाये तो उसका कोइ दोष नही है. हमरी बनावट हि ऐसी है. स्वयम मे हम आकर्षण और प्रतिकर्षण के नियमो से बुरी तरह बन्धे है. जब जिस चीज ने हमे आकृष्ट किया हमने उसे हासिल करने के लिये सातों जहान एक कर दिये और जब वहि आकर्षण खत्म हुआ. तो सालो से सहेजी चीज पल भर मे खाक कर दी जाती है. यह आकर्षण हि है जो हमे जिन्दा रखता है और ये प्रतीकर्षण हि है जो हमे मरने नही देता.
हमे अपने लिये नये रास्ते तलाशते रहते है. एक उम्मीद मे कि हो ना हो आने वाल कल खुद मे जरुर कु्छ बेहतर समेटे होगा. यह फ़िल्म मनुष्य के इतिहास का जीता जागता उदाहरन है.और क्या खूब उदाहरन है. अकेलेपन के साथ जिया जा सकता है बशरते उसे आपने खुद बनाया हो वो सिर्फ़ आपके आसपास फ़ैला हो लेकिन यही अकेलापन जब हर तरफ़ फ़ैल जाता है तब मुश्किले खडी हो जती है.जब इसका चुनाव आप करते है तब आप चुनाव करते है किसी से नही बोलने का लेकिन सबको सुनने का, जब आप कि इच्छा हो तब. लेकिन अगर आप्से चुनाव क यह अधिकर छीन लिया जाये तब क्या होग..एक दिन ..दो दिन…तीन दिन…आपक अहम आप्को कमजोर नही होने देग..इस्के बाद….आप दीवरो के झरोखो से दूसरो कि अवाजे सुनने के लिये परेशान हो उठेगे.और दीवरो के कान बनकर रह जायेगे.
हमारे लिये हर चीज जरुरी है हसना रोना चिलाना गाना यहाँ तक कि लड्ना भी….अखिर इन सब को परत दर परत जमा कर के ही तो हम अप्नी यादो क खाता भरते है वर्ना भागते हुये समय से हमे हासिल हि क्या होता है. अगर आप्को अब भी मेरी बातो मे यकीन नही हो रहा है तो एक बार हि सही किराये पर हि सही कास्ट अवे देखिये जरूर. और खुद को नायक कि जगह रखकर देखिये . तब आपको पता चलेगा कि अपने आप से रूबरू होना इतना आसान नही. अपनी कमजोरियों को जीतना इतना मुश्किल भी नही.