एक दिन की पाकेटमनी

रोज सुबह
तकिये के नीचे
एक दिन की पाकेटमनी पाता हूँ

और फिर
कब, कहाँ, कैसे, खर्च करूँ
के हिसाबे में लग जाता हूँ

आठ घंटे का आफ़िस
चार घंटे का आना-जाना
मिश्रा जी की शिकायत है
“बाबू बदल गए हो, हमारे लिए टाइम नहीं रहा अब “
आज उनके यहाँ भी निपट लेते हैं
एक-आध घंटे में निकल लेंगे

बाथरूम का नल महीनों से चू रहा है
प्लंबर को भी बोलना है
गाड़ी की सर्विसिंग पेंडिंग पड़ी है
वो कल देखी जायेगी

घर आकार बीवी बच्चों के हजार काम निपटाता हूँ
कभी चाय की पत्ती लाता हूँ
कभी चुन्नू को घुमाने ले जाता हूँ
थोड़ी देर टी.वी. पर चाहे अनचाहे उलझ जाता हूँ
जैसे उसे घर में रखने का टैक्स भर रहा हूँ

बची खुची रेजगारी के साथ
वापस तकिये के सिरहाने आता हूँ
इनसे तो पूरी नींद भी ना खरीदी जायेगी
अपने हिस्से में आज भी कुछ नहीं आया

कुछ देर खीझता हूँ
अपनी उम्र के गुल्लक को हसरत भरी नजर से देखता हूँ
कब से एक अठन्नी भी नहीं डाली इसमें
बचपन में जो कुछ बचाया था
या खर्च नहीं कर पाया था
वही गाहे-बगाहे खनक उठता है

सोचता हूँ
कल कुछ ना कुछ करके
थोड़ा बहुत अपने लिए भी बचाकर लाऊँगा
और
हिसाब-किताब को दे कर पूर्ण-विराम
तकिये को भींचे हुए सो जाता हूँ

लेकिन अगर
कल तकिया उठाऊं
और पाकेटमनी ना मिले तो ?

प्रश्न और प्रतिउत्तर

हां मुश्किल है
स्वयं के फ़ैसले पर हर बार विश्वास कि मुहर लगाना
हर बार सही साबित होना
ऐसा हो नही सोचता मै
फ़िर क्या इस बार
तुम्हारा फ़ैसला कर लू स्वीकार
ढक जाने दू अनिश्चय को अपने
तुम्हारे दिखाये भविष्य की छांव में
लेकिन वर्तमान के लिये नही कुछ कहते तुम क्यु
करू मै क्या
रास्ते के बीच मे हू
क्या छोड़ दू इससे आगे का ख्याल
अगर हां
तो जो दूरी तय की
जिस सफ़र को साथ ले आया हू यहा तक
उसे कहां छोडूं,
कैसे छिपाऊ
इन सबके साथ तुम्हाए फ़ैसले को
क्या सच मे स्वीकार कर सकूगा मैं
प्रतिउत्तर नही करूगा
लेकिन
पहले मेरे प्रश्नों क उत्तर दो

विश्वास किया मैने तुम पर.

प्रारंभ कर रहा हू कविता तुमको
जोड गांठ कर शब्दो को
एक विश्वास समेटकर मन मे
तुम मेरे मौन को व्यक्त कर पाओगी
जब कभी नजरे ठहर कर झुक जायेगी
आती जाती सांसो मे मन के भाव
नवजात उम्मीदे बह जायेगी
तुम थामोगी शब्दो का प्रवाह
पिरोओगी उन्की लडी
अनकहा सब कह पाओगी
कविता मेरा मौन बोझ है मुझ पर
दबता जा रहा हू हर पल हर दिन
सह रहा हू कब से पीड़
शब्दो कि रह गये जो भीतर
विश्वास कर रहा हू
तुम हरोगी सब
एक नया जीवन दे पाओगी

साहित्य- यत्र तत्र सर्वत्र

साहित्य अगर सिर्फ़ शब्द होता तो शायद पन्नो कि कैद से अजाद न हो पाता। साहित्य अगर सिर्फ़ कविता होता तो रात्रि के आकाश ,स्त्री मन की आस , और नदी की प्यास मे ही खोया रहता. साहित्य अगर केवल बिम्ब होता तो तो कितनी आवाजे खामोशी की चादर मे सिमट्कर रह जाती. सहित्य तो सब कुछ है… साहित्य तो हर जगह है ..यत्र तत्र सवत्र… पहली साहित्यिक रचना क्या रही होगी इसका अनुमान नही लगाया जा सकता. सबसे पहला साहित्य्कार कौन रहा होगा.इस प्रश्न क उत्तर भी मुश्किल है. मनुश्य प्रक्रति कि विशिष्ट रचना है. और मनुष्य की हर भाव भन्गिमा गतिविधि साहित्य है. हमारी ऐतिहसिक धरोहरे इन दोनो का सन्ग्रह ही तो है. साहित्य ने हमारे लोक गीतो से बोलना सीखा. न्रत्य की मुद्राओ मे ढला मौन अभिव्यक्ति का माध्यम बना. जब भाषा का आविष्कार हुआ तो गीत और कहानी बना. समय बदला युग बदले साहित्य की परिधि बढ्ती रही. आज साहित्य के दायरे से कुछ भी अछूता नही है. मेरी कोशिश है साहित्य का एक कोना पकड्ने की .