इन द मूड फ़ार लव

2009 October 30

लव स्टोरी तो आपने बहुत देखी और सुनी होगी लेकिन इस कहानी की बात ही कुछ और हॆ. हागकांग के निर्देशक ’ वांग कर वाई ’ द्वारा लिखित और निर्देशित यह फ़िल्म अपने बेह्तरीन संगीत और कॆमेरा के लिये भी जानी जाती हॆ. ’ युमेजी ’ की किलिंग OST TUNE और ’ क्रिस्टोफ़र डायल ’ का MOVING CAMERA  देखने वाले को एक अलग ही दुनियां मे ले जाता हॆ.

in_the_mood_for_love_movie1

कहानी की बात करे तो कुछ यु हॆ कि एक नयी बिल्डिंग मे दो नवविवाहित जोडे आकर रुकते हॆं. और बाद मे पता चलता हॆ कि फ़िल्म के नायक की पत्नी का फ़िल्म की नायिका के पति के साथ संबंध हॆ. दोनों को ये बात पता हॆ लेकिन वे एक दुसरे को बताते नहॆ हॆ. उल्टा ऐसे व्यव्हार करते हॆ. जैसे उन्हे कुछ नही पता. लेकिन आखिर कार एक मोड पर राज खुल जाता हॆ. सवाल ये हॆ कि अब क्या करे ? नायिका का पति काम से अक्सर काफ़ी दिनो के लिये बाहर रहता हॆ. नायिका नायक कि मद लेती हॆ कि जब उसका पति आयेगा तो वह उससे कैसे पूछेगी. नायक पति की भुमिका अदा करता हॆ. और उसकी मदद करता हॆ.

लेकिन यह नाटक खेलते खेलते दोनो एक दूसरे को पसंद करने लगते हॆ. लेकिन वो अपने अपने पार्ट्नर की तरह नही बनना चाहते. इस्लिये दोनो एक दुसरे से अलग रहने का फ़ैस्ला करते हॆ. और नायक शहर छोड्कर चला जाता हॆ.

in the mood for love २

वांग कर वाई , विजुअल आर्टिस्ट हॆ. उन्की फ़िल्मॊ मे रंगों का खूबसूरत प्रयोग देखने को मिलता हॆ. जहा उन्की ’ चुंगकिंग ए़क्स्प्रेस्स ’ मे लाल पीला और सफ़ेद र्ंगों की अधिकता हॆ व्हीं यहां पर लगभग सारी फ़िल्म मे लाल रंग छाया रहता हॆ. प्यार को प्रदर्शित करने कए लिये और कौन सा रंग चुना जा सकता हॆ ? फ़िल्म मे बहुत ज्यादा कॆरेक्टर नही हॆ, लेकिन कभी इसकी आवश्यकता भि महसूस नही होती. यही हाल लोकेशन का भी हॆ, ले देकर ४-५ जगहो पर पूरी फ़िल्म उतार ली गयी हॆ.

अपनी फ़िल्म मे इत्ने मे तो एक गाना भी नही बनता. खैर बालीवुड किइ बात अलग हॆ.

तो अगर आप लव स्टोरी देखना पसंद करते हॆ, खासकर वियोग वाली तो यह फ़िल्म आपके लिये हॆ. यकीन मानिये आप्को निराशा हाथ नही लगेगी. और अगर आप्ने आजतक कोई अच्छी लव स्टोरी नही देखी तब भी यह फ़िल्म आपके लिये हॆ. इसे ढूढ्ने मे थोडी मेहनत शायद आपको करनी पडे लेकिन फ़िर अच्छी चीजे बिना मेहनत के कहां मिल्ती हॆ.

चलते चलते आपको फ़िल्म के संगीत की एक झलक देते चले.

नाट वन लेस

2009 October 27

इंडिया और चाइना मे कम से कम एक सम्स्या तो आम हॆ – ग्रामीण और शहरी जीवन की असमानता. इसकी एक बेहतरीन झलक आप चायनीज फ़िल्म डायरेक्टर ’ झॆंग यिमु ’ की इस फ़िल्म मे देख सकते हॆ.

not one less

कहानी कुछ इस तरह से हॆ कि सुदुर के एक गांव मे एक १३ साल की लड्की ’ वे मिंझी ’ सब्स्टीट्युट की तरह वहा के एक मात्र स्कूल मे कुछ दिन पढाने के लिये आती हॆ. उस पर जिम्मेदारी होती हॆ कि स्कूल से एक भी बच्चा कम न होने पाये. लेकिन यह इलाका इतना गरीब हॆ कि बच्चे किसी ना किसी वजह से स्कूल छोड देते हॆ. एक लड्का जब घर के खर्च चलने के लिये शहर चला जाता हॆ. तो वे मिंझी उसे किसी भी तरह से वापस स्कूल लाने की ठान लेती हॆ.

लेकिन जब वह लड्के को ढूढने शहर आती हॆ तब उसे यहा के कायदे कनूनो से दो चार होना पडता हॆ. ये और बात हॆ कि हर मुसीबत का सामना कर्ते हुये अन्तत: वह लड्के को ढूढ ही लेती हॆ. और वापसी मे उसके साथ मीडिया गाव मे आता हॆ, जइसे इससे पहले पता भी नही था कि उन्के शहरो से दूर कुछ ऐसे गाव ,स्कूल और बच्चे भी हॆ. जिनके पेट को उतना भी नसीब नही होता जितना कि वो फ़ेंक देते हॆं.

कहानी बहुत हि इमोशनल हॆ और सीधी साधी. बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात दर्शको तक पहुचाती हॆ. और सब्से बडी बात ये कि फ़िल्म के सारे ही कलाकार नये हॆ. और उन्मे से कई तो वास्तविक जीवन मे  भी वही लाइफ़ जी रहे थे जो कि फ़िल्म में.

अपने देश के हालात भी कुछ ऐसे ही हॆं , ऐसे मे इस फ़िल्म को एक बार देखने कि गुजारिश मॆं सब्से करुगा.

अहसास

2009 October 27

Black (25)

तुम हो ही नही

तुम्हारे होने का अहसास है

और यहा अभी इस पल

इस खुरदुरे पन्ने से निकलकर

अहसास से विश्वास मे ढलकर

तुम सजीव हो

तुम मेरे पास हो

अभी मैं अधूरा

2009 October 25
by Hemant Patel
अभी तो खाली हू
अभी तो प्यासा हू
अभी तो अधूरा हूअभी मै हू ही नही
निर्माण के प्रथम चरण कि इमारत सा
हर रोज आकार मे थोडा और उभरता जाता हू
वक़्त आने पर द्वार पर रंगोली सजेगी
कुमकुम मे रंगी दस उन्गालियोँ कि छाप दीवारों पर चढेगी
जब तुम्हारे हाथ मे टिकेगा एक दोना
और मुह मे घुलेगी मिठास.
तब समझना हो गया मैं पुरा
अभी मैं बन रहा हू ,
अभी मैं हू अधूरा

कला सिनेमा और व्यवयसायिक सिनेमा

2008 April 23
by Hemant Patel

अक्सर हिन्दी सिनेमा को लेकर यह बहस होती रहती है कि आखिर हमे कला फ़िल्मे क्यु बनानी चाहिये और जवाब मिलता है कि ताकि समाज कि सही तस्वीर लोगो के सामने रखी जा सके जो कि आज का कमर्सिअल सिनेमा नही कर रहा.वह मात्र पैसा कूटने मे मग्न है. बात देखी जाये तो सही भी है.लेकिन फ़िर सवाल उठता है कि कला सिनेमा हि कौन सा समाज का भला किये दे रहा है.फ़िल्मे तो बनती है लेकिन कोइ देखता हि नही.बहाने हजार है इस्के पीछे, कोइ कहता है भाई लोग देखने ही नही आते,लोग सिनेमा को मात्र नाच गाने का माध्यम ही समझते है. फ़िल्म्कार कहते है कोइ पैसा लगाने को ही तैयार नही.और भी ना जाने क्या क्या. अब इसमे कित्ना दूध है कितना पानी.ये तो वही लोग जाने.लेकिन जो जड़ से जुड़ा सवाल है वो यह कि भाई सिनेमा कोइ दो चार रुपये मे चलेने वली किराने कि दुकान नही है,एक फ़िल्म देखने और भूल्ने मे भले ही२-४ दिनो से ज्यादा न लगे लेकिन उसे बनाने मे सालो लग जते है.कुल मिलाकर यह वह कला है जो सबसे ज्यादा मह्गी है और सबकी चहेती है.इस्लिये सबसे पहली बात तो यही है कि अगर तुम्हरी फ़िल्म को लोग देखने ही नही आ रहे है और वह देश से बाहर पुरस्कार पे पुरस्कार जेत रही है.बडी बडी मैगजीनो पे जगह पा रही है,यानी कि आम आदमी पर बनी फ़िल्म खास लोगो के लिये आयोजित खास शो मे केवल दिखायी जा रही है. तो ऐसी कला फ़िल्म के क्या मायने.आखिर अगर कुवे को खोदने वाले को ही उसका पानी ना मिले तो लाख दुनिया भर से कहो अहा! कितना मीठा पानी है उस्के लिये तो खारा हि रहेगा ना.ऐसे मे अगर आम आदमी अपनी प्यास बुझाने के लिये कमर्शियल सिनेमा की तरफ़ मुह उठाता है तो क्या बुराई है.इसका मतलब ये नही कि कला सिनेमा बनना ही नही चाहिये मतलब यह है कि हमे उसे बदलना चाहिये.अगर हर रूह तक सन्देश नही पहुच रहा है तो हमे अपनी आवाज ऊची करनी चाहिये ना कि सुननए वलो से यह उम्मीद कि वो नजदीक आये.आखिर्कार हम वही कर सकते है जो हमारे हाथ मे है.क्यु ना कुछ ऐसा किया जाये कि कोइ बीच से रास्ता निकाला जाये.एक बार ही सही लोगो को जरा स्वाद तो चखने दो क्या पता अगली बार सिनेमा एक कदम चले तो वे दो कदम आगे आ जाये.इस समय हम हर दिशा मे आगे जा रहे है केवल सिनेम ही है जिसकी गति उम्मीद से पीछे है, हमसे कही छोटे छोटे देश मीलो आगे निकल गये है. यहा तक कि ईरान जैसे देश ने भी विश्व सिनेमा जगत मे अपनी अलग पहचान बनयी है.और एक हम है कि इस तेज रफ़्तार दौड मे घिसट घिसट कर बढ रहे है.

मीडिया और शोषण – PART 2

2007 December 4
by Hemant Patel

अब बढते हैं आगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो हम दंग रह गये. मीडिया क्या है ? उसका क्या काम है ?क्या तौर तरीके हैं ? इन सबके बारे मे यु तो कालेज मे ही काफ़ी पता चल गया था. इसलिये इस बात कि तो हमने कोइ उम्मीद ही नही कि थी कि जते ही हमे हमारी पसंद की चीज दे दी जायेगी. बस यही था कि जो भी मिलेगा उसे जीजान से करेगें. और सथ मे आस्पास के माहौल को देखेगे जानेगे.सो हम्ने वही किया.रनडाउन दिया गया हफ़्ते भर मे सीख लिया.अब क्या नयी मशीन आयी थी वास्प 3D . अब भाई इंटर्न होने के नाते हमे ही सीखनी थी सो हमने सीख ली.हा ये और बात है कि हमारी कंप्युटर मे जो रुचि बचपन से थी उसने हमारी मदद की. और पिछ्ले कै सालो से घर मे इस य़ंत्र की जीभर कर जो चीड फ़ाड की थी उसके चलते इसकी रग रग से वकिफ़ थे.

कुल मिलाकर हमने सीख लिया. और बस लग गये काम मे नया काम था मन लगाकर लिया.और करते गये.फ़िर एक दिन ध्यान आया कि यार कर क्या रहे हैं ऐसे तो कोइ पूछ ही नहे रहा है कि और भी कुछ करना है कि नही. आखिर कब तक खबरे ब्रेक करते रहेगे. इस दौरान बाकी लोगो से मिलने का मौका मिला उनका काम देखने को मिला.और फ़िर लगा कि यार अगर हमे मौका मिला तो इनसे तो बेहतर ही करेगे.किसी की बुराइ नही कर रहा लेकिन हा कभी कभी अफ़सोस भी हुआ कुछ लोगो को देख्कर जिन्हे हिंदी भी ढंग से नही आती वे लोग भी हमसे बेहतर काम कर रहे थे. और यह सब देख्कर हम पहले तो इस उम्मीद मे थे कि आज नही कल हमे भी अपना हुनर दिखाने का मौका मिलेगा.पर नही २ महीने बाद पता चला आप्को इसी सीट पर फ़िक्स किया जा रहा है क्योकि आप काम ठीक कर रहे हैं.

ये लो .. अब इसका क्या मतलब हुआ.हम काम कर रहे हैं क्योकि हमे दिया गया वो हमारी जिम्मेदारी थी .हमने पूरी की.लेकिन ये क्या कि जो हम चाहते है उसके बारे मे एक बार पूछा भी नही गया.आप १० घंते काम कराते हो ठीक है पर इसका मतलब ये नही की आप जो चाहो सिर्फ़ वही हम करे.फ़िर पिछ्ले तीन साल से जो झक मार रहे थे उसका क्या? जो इतना स्पेस्लाइजेशन किया वो तो गया बिन में. हद तो तब हो गयी जब अपने ही हेड से अपनी बात कहने गये तो जवाब मिला . इस तरह बात नहे करते कि मेरा काम बदल दो अन्यथा मै आप्का संस्थान छोड्ना चाहुगा.भाई हम तो सीरियस थे . और जो दिल मे था बडे ही स्पष्ट शब्दो मे आप से कह दिया.आप भी एक शब्द मे कह देते हा या ना. पर आप कुर्सी पर है इस्लिये होथो पर उगली रख्कर कह सकते है कि १ हफ़्ते बाद आना तब बात करेगे.

आखिर क्यु ? एक तो पिछ्ले २ महीने से जो भी काम दिया गया हमने उसे अच्छे से किया. आप्को कभी भी उगले उठाने का मौका नही दिया. और आज जब आपसे कुछ कहना चाहा तो एक हफ़्ते बाद आना. वाह रे मीडिया पुरुष. तुम मुझे उस सीट पर जाब देने को तैयार जो लेकिन मेरा काम नही बदलोगे क्योकि इससे तुम्हारे सम्मान को ठोकर लगती है कि मै तुम्हातरे दिए काम को अस्वीकार कैसे कर सकत हु. और मै जो तुम्हे अश्सावसन देता हू कि मुझे मेरे मन का काम दो मै तुम्हारे बाकी लोगो से बेहतर करके दिखाउगा तो तुम्हे वह स्वीकार नही. क्योकि मीडिया मे ‘तुम जाओगे तो हजारो पडे है ‘ इसलिये सिर्फ़ तुम बोलोगे और हजारो लोग सिर्फ़ सुनेगे.

फ़्रीडम आफ़ एक्स्प्रेशन के नाम पर हमने मीडिया मे कदम रखा था यहा तो हमारी ही एक्स्प्रेशन को ही लकवा मार गया. आप जानते क्या हो अभी हमारे बारे मे इंटर्न ही तो है उन्हे मौका तो दो खुद को साबित करने का. मैने तो खुद को साबित करना चाहा जो आपने दिया मैने किया अब जो मै चाहता हू वो मुझे मिलना चाहिये. सच तो यही कहता है लेकिन यहा तो बात हे निराली है चुकि आप अभी नये हैं इसलिये भले ही कितना अच्छा काम करे आप को काम नही मिलेगा. बात यहे खत्म नही होती. कुछ चीजे और भी है जिन्हे मीडिया मे उतरने से पहले मैने सुना था उन्से भी इस दौरान रूबरू होने का मौका मिला. वो हम बात करेगे अगली बार..continue

संजय दत्त – क्या खोया क्या पाया – पार्ट 3 अंतिम कडी

2007 November 29
by Hemant Patel

मुन्नाभाई मे उनकी और अरशद वारसी का कांबिनेशन कमाल का था.अलहदा पतकथा और सधा हुआ निर्देशन साथ मे बेहतरीन अभिनय – कुल मिलाकर एक संपूर्ण फ़िल्म जिसे देश ही नही विदेश मे भी जमकर सराहा गया.फ़िल्म भले ही हास्य प्रधान थी लेकिन इसने गांधी जी के आदर्शो को किताबो से निकाल्कर लोगो के बीच ला खडा किया.फ़िल्म के लिये एक बार फ़िल्म संजय को फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड मिला.लेकिन इस बार कैटेगरी थी-बेस्ट कामेडी एक्टर.

अब जब इस तरफ़ सब कुछ सही चल रहा था,संजय को एक बार फ़िर १४ साल पहले किये गुनाह से दो चार होना पडा.टाडा कोर्ट ने मुंबई ब्लास्ट मे आरोपियो के मामलो की सुन्वाई पूरी की और ३१ जुलाई २००७ को टाडा कोर्ट के जज पीडी कोडे ने उन्हे ६ साल की कैद की सजा सुनाई.और संजय दत्त एक बार फ़िर सलाखो के उस पार पहुच गये.जहा पहुचने का रास्ता उन्होने अपने ही हाथो १४ साल पहले बनाया था.संजय की सजा पर मीडिया मे फ़िल्म इंदस्ट्री मे,और आम जनता मे भी जमकर बहस हुई.सजा सही है या नही,सही है तो क्या १४ साल पहले के गुनाह की इतने सालो बाद इतनी कडी सजा उचित है.और भी हजारो बाते हवा मे तैर रही थी.लेकिन न्याय तो न्याद है वह यह सब नही देखता. उसके लिये जुर्म और अपराधी के बीच सबूतो की चारदीवारी होती है जिसके पार वह नही देख सकता.जज पीडी कोडे ने भी माना कि व्यक्तिगत तौर पर वे संजय दत्त की बेहद इज्जत करते हैं और उनके अभिनय के मुरीद है लेकिन कानून की द्रष्टि मे उन्होने जो अपराध किया है यह उसकी न्यूनतम सजा है और उन्होने वही किया. जो न्याय के सिंहासन पर बैठ्कर उन्हे करना चाहिये था.उसका मान उनके लिये सबसे पहले था बाकी सब बाद मे.

कुल मिलाकर संजय पर अभी भी इंडस्त्री के तकरबीन १.५ बिलिअन रुपये लगे है. अलिबाग,महबूबा,अन्थोनी कौन था, मुन्नाभाई चले अमेरिका,जैसी कई बडे बैनरो की फ़िल्मे उनके इंतजर मे हैं. फ़िल्हाल ताजा खबर यही है कि आज तारीख २९ नवंबर को उन्हे जमानत मिल गयी है. और यकीनन इससे इन फ़िल्मो के निर्माताओ ने चैन की सांस ली होगी.चैन की सांस तो संजय ने भी ली होगी.लेकिन ये शायद उन्हे भी नही पता होगा कि आखिर कब तक यह सांस उनके साथ रहेगी. संजय का जीवन उतार चढावो से भरा हुआ है.वे स्वयं मे चलते फ़िरते घटनाचक्र बन गये हैं जिनकी स्टोरी मे बालीवुड की फ़िल्मो के साए तत्व मौजूद हैं. और उनकी ही फ़िल्म कांटे का यह गीत उन पर एक्दम फ़िट बैथता है..जाने क्या होगा रामा रे ..जाने क्या होगा मौला रे….

संजय ने जीवन मे लगातार संघर्ष किया है. यही नही इन सबके चलते वे अत्यंत सौम्य और संवेदन्शील बन गये है.और दर्द से मुक्ति के लिये हास्य की दवा की खोज कर ली है .उनका हास्य्बोध उन्हे शक्ति देता है और जीवन को गति प्रदान करता है.इसके चलते हर बार वे पहले से बेहतर निखर कर आये हैं.देखना यह है कि इस बार संजय अपने चाहने वालो को क्या खास पेश करते हैं….

संजय दत्त – क्या खोया क्या पाया – पार्ट 2

2007 November 29
by Hemant Patel

अब इसे संयोग ही कहेंगे कि इसी साल खलनायक फ़िल्म मे परदे का नायक असल मे खलनायक बन गया. १९९३ मुंबई ब्लास्ट मामले मे संजय पर हादसे के मुख्य आरोपी अबु सलेम की मदद करने का आरोप लगा.अवैध रूप से AK 56 रखने व बाद मे उसे नष्ट करने के मामले मे टाडा कोर्ट मे उनके खिलाफ़ मुकदमा दर्ज किया गया.संजय का कैरियर इससे पहले की अपनी ऊचाईयों को छू पाता उस पर ब्रेक लग गये.ये प्रकरण अभी खत्म नही हुआ था. बस कह सक्ते है कि पिता के प्रयासो व रसूख के चलते उन्हे बाकी आरोपियो की जगह कही अधिक सुविधाये नसीब हुई.

जेल से निकलने के बाद संजय संजू बाबा बन गये और उनका झुकाव अध्यात्म की तरफ़ हो गया. लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. एक बार फ़िर निजी जीवन की परेशानिया उनके सामने आकर खडी हो गयी.पत्नी रिचा शर्मा जिससे उन्होने १९८७ मे शादी की थी उन्हे कैंसर हो गया.और वे अलग हो गये.रिचा अपनी पुत्री त्रिश्ना के साथ अमेरिका अपनी मां के यहा चली गयी.१९९६ मे उन्की मौत हो गयी और फ़िर संजय को अपनी पुत्री के लिये अप्ने ससुराल वालो से लड़्ना पडा. जिसमे वे हार गये.

बहरहाल उनके फ़िल्मी कैरियर पर वापस आते हैं…. रामगोपाल वर्मा ने १९९८ मे उन्हे दौड़ मे काम करने का मौका दिया. जिसने उनके लिये नयी फ़िल्मो के द्वार खोल दिये . इसके बाद संजय के भाग्य का सितारा चमका और उन्होने एक ही साल १९९९ मे हिट फ़िल्मो की हैट्रिक लगायी. इसमे दाग – द फ़ायर,हसीना मान जायेगी,और वास्तव शामिल हैं.महेश मांजरेकर की फ़िल्म वास्तच मे अभिनय के लिये इन्हें बेस्ट एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला.यह समय संजय के लिये काफ़ी अच्छा साबित हुआ.२००१ मे उन्होने अपनी लंबे समय की गर्ल्फ़्रेंड रिया से वैलेंटाइन डे पर ताज होतल मे शादी कर ली.यह और बात है की आगे चलकर दोनो का तलाक हो गया.रिया ने संजय को तब मानसिक और आत्मिक सहारा दिया था जब उन्हे उन्की सबसे ज्यादा जरूरत थी.शायद उन्हे लगा कि रिया के साथ कम से कम उनका टूटे दिल को और दर्द नही सहना पडेगा.लेकिन यह बस भावनाओ का कमजोर पुल साबित हुआ. जो जरा सा अधिक बोझ होने पर बिखर गया, टुकडे टुकडे हो गया.आखिर शादी सिर्फ़ सहारे का नाम तो नही ही है.

संजय ने इस बीच अपने मित्र संजय गुप्ता के साथ मिल्कर white feathers नाम की प्रोड्क्शन कंपनी की स्थापना भी की. और कांटे,मुसाफ़िर,शूट आउट एट लोखंडेवाला जैसी हिट फ़िल्मो का निर्माण किया. २००३ मे संजय को लेकर राज्कुमार हिरानी ने ‘मुन्ना भाई MBBS’ बनायी.जिसकी अपार सफ़लता ने संजू बाबा को एक नयी पहचान दी.उनकी गांधीगिरी ने लोगो का दिल जीत लिया.

संजय दत्त – क्या पाया क्या खोया

2007 November 29

स्टार एक्टर सुनील दत्त और मदर इंडिया यानि नरगिस की संतान संजय दत्त को उन्के पिता ने १९८१ मे राकी के जरिये बडे परदे पर लांच किया था.ये और बात है की रगो मे अभिनय का खानदानी खून होने के बावजूद उनकी शुरुआत अच्छी नही रही. और विधाता १९८२,हथियार १९८९,नाम १९८६,जैसी फ़िल्मे कुछ खास असर नही छोड पायी. इसके पीछे क्या वजह रही यह कहना थोडा सा मुश्किल है क्योकि अभिनय जगत से तो वे बच्पन से ही जुडे थे.और सुनील दत्त की फ़िल्म रेशमा और शेरा मे एक कव्वाली सिंगर के रूप मे काम भी कर चुके थे.कुछ लोग इस्की वजह उनके निजी जीवन को मानते है.

संजय दत्त की पर्सनल लाइफ़ हमेशा से ही विवादो मे रही है.जब वे हाईस्कूल मे थे तभी ड्रग के शिकार हो गये.इसके चलते उन्की मां नरगिस की तबियत खराब रहने लगी.वे पहले से ही कैंसर से जूझ रही थीं. ऐसे मे अपने बेटे की हरकतो को बर्दास्त नही कर पायी.और संजय दत्त की पहली फ़िल्म रिलीज होने से पहले ही इस दुनिया से चल बसी.बाद मे सुनील दत्त ने संजय को टेक्सास के रिहैबिटेशन सेंटए भेजा.वहा से वापस आने के बाद संजय ने फ़िर से अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की.९० के दशक के शुरुआत मे उन्की फ़िल्म ‘सड़्क’ [१९९१] आयी. जो उनके कैरियर के लिये टर्निंग प्वाइंट साबित हुइ.इस फ़िल्म ने उन्हे अभिनय जगत मे सडक से उठाकर सिंहासन तो नही पर हा बेहतर जगह मे पहुचा दिया.इसी साल एक और सुपर हिट फ़िल्म संजय दत्त के हिस्से मे आई साजन. जिसके लिये उन्हे पहली बार बेस्ट एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला.

वैसे वे इस मुकाम तक काफ़ी पहले ही पहुच सकते थे.१९८३ मे जब सुभाष घई हीरो बना रहे थे तो संजय उन्की पहली पसंद थे लेकिन ड्रग मे उन्की संलिप्तता को देखते हुये उन्होने उन्की जगह जैकी श्राफ़ को मौका दिया.बाद मे हीरो सुपर हिट हुई. और फ़िल्म इंडस्ट्री को जैकी के रूप मे एक नया रफ़ एंड टफ़ हीरो मिल गया. सुभाष घई ने संजय को अपनी बहुचर्चित और विवादास्पद फ़िल्म खलनायक मे मौका दिया.जो एक बडी हिट साबित हुई. विशेष रूप से इसके एक गीत विशेष ने सबका ध्यान खीचा.यहा तक की सेंसर बोर्ड भी बच नही पाया.आकाश्वाणी से अब भी इस गीत का प्रसारण नही किया जाता,क्योकि यह सरकार द्वारा तय मापदंडो मे खरा नही उतरता.वैसे इस फ़िल्म की नायिका डांस क्वीन माधुरी दीक्शित थी.इनके साथ संजय ने १९८९ मे थानेदार फ़िल्म की थी.उस समय दोनो के रोमांस के किस्से खूब मशहूर हुये थे.ये और बात है की इस रोमांस का सारांश ‘कुछ नही’ निकला.

अपूर्णता

2007 November 27
by Hemant Patel

हम नही रख सकते
स्वयं को एक सा सदा के लिये
बदलना पडता है हमें
वक्त के साथ
वक्त के अनुसार
समेटना पडता है बहुत कुछ
हर जगह से
अपनी अपूर्णता को करने के लिये कम
जीवन भर करना पडता है
संघर्ष
अपनी अपनी अपूर्णता के अनुसार